मुसाफिर कहीं का

मुसाफिर कहीं का

मुसाफिर कहीं का कहीं पे खड़ा
ना आगे बड़ा वो ना पीछे हटा ।
क्या दिल में है उसके उसे ना पता
क्यों जग से हटा क्यों खुद से लड़ा ।

बड़ी गौर से देखें उसने सभी
शायद ना किसी पर उसे आता यकीन ।
हो खुद के ही बस में चला जा रहा
ना जाने खुदी में था उलझा हुआ ।

ख्यालों में उलझा हुआ था वहीं
मिला राह में उसको एक अजनबी ।
नजाने क्या उसके दिल को पड़ी
वो ठहरा तो दिल को सुकून आ गया ।

उसी मोड़ पर लम्हे कुछ थम गए
दिलों की ज़मीं में ही घर बन गए ।
दो रहने लगे एक होकर वहां
मिला था सुकून ना था कोई जहां ।

हुआ पाक रिश्ता नजारे हुए
ये मौसम भी सारे थे प्यारे हुए ।
थी कण कण में बसने लगी जिंदगी
पकड़ कर के हाथ चला कारवां ।

गुजरती गई हसीन जिंदगी
गुजरते गुजरते मुकाम आ गया ।
दो राही थे राहें भी दो हो गई
किसी एक को चलके जाना पड़ा ।

वो मजबूर थे , जाने इस बात को
भीगो कर वो आंखे वहां से गए ।
उन्हें जाते देखा इन्ही आंखों ने
ना रोक सका ना कुछ कर सका ।

ये सोचे बड़ा मुश्किल में पड़ा
मिला भी तो साथ ना क्यों रह सका ।
हुआ क्या करे क्या आसान कुछ नहीं
चुप था जुबान से ना कह भी सका ।

है वाकिफ ज़माने के आसूलों से तो
मगर साथ मासूम दिल को लिए ।
ख्यालों में उलझा उसी मोड़ पर
वो थम ही गया ना फिर चल सका ।

मुसाफिर कहीं का कहीं पे खड़ा
ना आगे बड़ा वो ना पीछे हटा ।

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